*संकट में मंदसौर का कंबल केंद्र:सरकारी ऑर्डर मिलना बंद हुए तो कंबल का उत्पादन 60% कम, सिर्फ 70 कर्मचारी बचे*

जन जागृति संगम 

मंदसौर की पहचान रहे "कंबल केंद्र' को लोगों व सरकारी विभागों की अरुचि के कारण चुनौतियां सामना करना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि तीन दशक पहले जहां एक सीजन में 15 हजार से अधिक कंबल के ऑर्डर आते थे, आबादी बढ़ने के बाद भी ये आंकड़ा सिमटकर आधे से भी कम रह गया है। कम ऑर्डर मिलने से अब कर्मचारियों को वेतन देने में भी मुश्किल अा रही है। जानकारों का कहना है कि इसके लिए सरकारी विभाग जिम्मेदार हैं। जिन्होंने भंडार क्रय नियमों में भी हस्तक्षेप करते हुए कंबल खरीदना बंद कर दिया है। एेसे ही हालात रहे तो मंदसौर के कंबल केंद्र को बंद होते देर नहीं लगेगी।

1956 में मंदसौर शहर में कंबल केंद्र स्थापित हुआ था। यहां काम करने वाले पूर्व मजदूर बताते हैं कि मंदसौर के कंबल केंद्र की ख्याति इतनी थी कि शहर में पहली बार कोई आईएएस या अन्य अफसर पहुंचता था तो पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन करके कंबल केंद्र ही पहुंचता था। अब समय के साथ सबकुछ बदल गया है। उत्पादन कम होने से कर्मचारियों की भी छंटनी होती गई। 1100 से भी ज्यादा परिवारों की रोजी- रोटी केंद्र से ही चलती थी लेकिन अब इनकी संख्या 70 ही रह गई है। पिछले साल 6 हजार कंबल का ही उत्पादन हुआ।

यहां राहत : सालों बाद मशीन शुरू, अब रंगाई छपाई सहित सभी काम मंदसौर में ही होंगे
मंदसौर कंबल केंद्र में बॉयलर मशीन खराब होने के कारण रंगाई-छपाई के लिए माल को ग्वालियर भेजना पड़ता था। 28 लाख से अधिक राशि से अब मंदसौर में ही मशीन स्थापित कर दी गई है। मंगलवार को इसकी टेस्टिंग भी की गई। ऐसे में अब कंबल की छपाई व प्रिंटिग, धुलाई-प्रेस सभी सुविधा मंदसौर में ही शुरू हो जाएगी।

हमारी पहचान : प्रदेश में ग्वालियर के बाद सिर्फ मंदसौर में ही केंद्र, जहां सभी सुविधाएं
प्रदेश में मंदसौर के अलावा ग्वालियर, टीकमगढ़ व छिंदवाड़ा जिले में कंबल केंद्र स्थापित हैं लेकिन सिर्फ मंदसौर व ग्वालियर ही ऐसे केंद्र हैं। जहां पर सारी सुविधाएं मौजूद हैं। यानी कि ऊन से धागा व धागा से कंबल बनाने की सुविधा के अलावा डाईंग, धुलाई व प्रेस सहित सारी सुविधा मंदसौर में उपलब्ध है।

सालों खराब नहीं होते और गर्म भी रहते हैं
मप्र खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के तहत संचालित कंबल केंद्र में 1450 से 1650 रुपए में कंबल मिलते हैं। ये 100 फीसदी ऊन से निर्मित होते हैं। सालों खराब नहीं होते और गर्म भी रहते हैं। जबकि बाजारों में मिलने वाले कंबल में मिक्सिंग मटेरियल रहता है।

विभागों ने निजी कंपनियों से खरीदी के लिए निकाली गली, अब रजाई खरीदने लगे
खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के अनुसार इस सीजन में 7 हजार कंबलों का ऑर्डर मिला है। इन्हें मंदसौर व ग्वालियर केंद्रों पर तैयार करवाया जाएगा। परेशानी की बात ये है कि वर्तमान में सिर्फ अस्पतालों से ही नाममात्र के ऑर्डर मिल रहे हैं जबकि जेल, छात्रावास व पुलिस सहित अन्य विभागों से ऑर्डर मिलना बंद हो गए हैं।

पुलिसकर्मियों को इसकी राशि भत्ते के रुप में मिलने लगी। भंडार क्रय नियम 2022 के अनुसार कंबल, बोर्ड का रिजर्व आयटम है यानी कि कंबल सिर्फ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से ही खरीद सकते हैं। लेकिन कुछ विभागों के अफसरों ने जेम पोर्टल के माध्यम से निजी कंपनियों से सामग्री खरीदना शुरू कर दिया है। नियमों से बचने के लिए कंबल की बजाय रजाई खरीदने लगे हैं। साथ ही तर्क भी ये है कि कंबल चुभते हैं।

सिर्फ अस्पतालों से ही नाममात्र ऑर्डर आ रहे
अभी इस बार 7 हजार कंबलों का ऑर्डर मिला है। सिर्फ अस्पतालों से ही नाममात्र ऑर्डर आ रहे हैं बाकी विभागों से ऑर्डर मिलना बंद हो गए हैं। यदि सरकारी विभाग रुचि दिखाए तो स्थिति सुधर सकती है। मंगलवार से बॉयलर मशीन भी स्थापित करके काम शुरू कर दिया है। ऐसे में अब रंगाई-छपाई सहित अन्य काम मंदसौर में ही होने लगेंगे।

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