*कलम को कब मिलेगा कवच? पत्रकार सुरक्षा कानून फाइलों में कैद, सवाल - किसके डर से रुका है इंसाफ*
*जन जागृति संगम**हुकूमत-समाचार*
मंदसौर। इस देश में सबको सुरक्षा का अधिकार है। नेता को Z-Plus मिलती है। अफसर को गनमैन मिलता है। गवाह को कोर्ट से सुरक्षा मिलती है। अपराधी को भी जेल की सलाखों के पीछे सुरक्षा मिलती है।
*मगर जो सबकी सुरक्षा के लिए लिखता है, उसकी सुरक्षा कौन करेगा?*
वो पत्रकार, जो माफिया के साम्राज्य पर सवाल उठाता है। जो नेता की रैली नहीं, उसकी फाइलों का सच दिखाता है। जो गुंडे की गोली से पहले कैमरे का लेंस तान देता है। उसकी कलम आज भी असुरक्षित है।
सालों से एक ही माँग गूंज रही है - *"पत्रकार सुरक्षा कानून तुरंत लागू हो।"* ज्ञापन से फाइलें भर गईं। धरनों से सड़कें थक गईं। आश्वासनों से दीवारें रंग गईं। मगर कानून धरातल पर नहीं उतरा।
*क्यों? अटका कहाँ है?*
*दुविधा 1: कलम का निशाना कौन है?*
कानून की कलम उसी के हाथ में है, जिसकी काली करतूत पर पत्रकार की कलम चलती है। भ्रष्ट नेता, रिश्वतखोर अफसर, खनन और शराब माफिया - इन सबके खिलाफ रिपोर्ट लिखने वाले को सुरक्षा देने का कानून, ये लोग आसानी से बनाएंगे? अपना फंदा अपने हाथ से कौन तैयार करता है?
*दुविधा 2: 'परिभाषा' का बहाना*
सरकारें कहती हैं - पत्रकार की परिभाषा क्या हो? कौन असली, कौन फर्जी? इसी बहाने फाइल लटक जाती है। मगर जब हमला होता है तो हमलावर प्रेस कार्ड नहीं मांगता। उसे सिर्फ इतना पता होता है कि इसने मेरे खिलाफ लिखा है। मंदसौर जैसे जिलों में भी ग्रामीण पत्रकार आए दिन धमकियों और झूठे मुकदमों का सामना करते हैं, पर सुरक्षा के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलता है।
*दुविधा 3: 'IPC काफी है' का तर्क*
कहा जाता है कि हत्या, मारपीट, धमकी की धाराएं IPC में पहले से हैं। फिर अलग कानून क्यों? जवाब सीधा है - अगर IPC काफी होती तो डॉक्टर प्रोटेक्शन एक्ट क्यों बनता? एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट क्यों आता? क्योंकि माना गया कि डॉक्टर पर हमला स्वास्थ्य सेवा पर हमला है। तो पत्रकार पर हमला लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला क्यों नहीं है? *पत्रकार पर हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे समाज की आंख फोड़ने की कोशिश है।*
*सबसे बड़ा सवाल: तकनीकी अड़चन है ही नहीं।*
महाराष्ट्र ने पत्रकार सुरक्षा कानून 2017 में बनाया। छत्तीसगढ़ ने 2023 में बनाया। मतलब रास्ता है, नीयत का अभाव है। कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ जर्नलिस्ट्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पत्रकारों पर हमले के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, मगर सजा की दर नगण्य है। जब तक विशेष कानून नहीं होगा, हमलावरों के हौसले बुलंद रहेंगे।
जब तक पत्रकार को खबर लिखने से पहले अपने परिवार की सुरक्षा सोचनी पड़ेगी, तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता सिर्फ भाषणों में जिंदा रहेगी। इस पीड़ा को लेकर आज प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा जी से सौजन्य मुलाकात में भी चर्चा हुई और उनसे कानून शीघ्र लागू कराने का आग्रह किया गया।
सरकार से माँग नहीं, अब हिसाब चाहिए - *पत्रकार सुरक्षा कानून तुरंत लागू हो। क्योंकि लोकतंत्र की सांस, पत्रकार की कलम में बसती है। और कलम पर ताला लगाना, लोकतंत्र का गला घोंटना है।*
*संपादक*
*दैनिक मालवा की हुकूमत*
*मो. 9630293934*
*हुकूमत-समाचार*
*"सरकारें आएंगी-जाएंगी, कलम यहीं रहेगी: मोहन सरकार, अब करो या भरो! पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करो, वरना अंजाम भुगतो"*
*हुकूमत-समाचार*
*विशेष रिपोर्ट*
*अब आर-पार की लड़ाई: भाषण नहीं, 'पत्रकार सुरक्षा कानून' चाहिए*
*मंदसौर।* मध्य प्रदेश में "सुशासन" और "कानून-व्यवस्था" के जुमले बहुत हो गए। मंच से "जीरो टॉलरेंस" की बातें बहुत हो गईं। मगर जमीन पर जब पत्रकार रेत माफिया, शराब माफिया या भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ कलम उठाता है, तो सबसे पहले उसी पर हमला होता है।
*सबसे बड़ा सवाल:* इस प्रदेश में नेता को Z-Plus सुरक्षा, अफसर को गनमैन, अपराधी को जेल में भी सुरक्षा... *मगर सच लिखने वाले पत्रकार के लिए सुरक्षा का कानून कहाँ है?*
*सरकारे आती-जाती रहेगी, पत्रकार इधर-उधर नहीं होता।* जो सरकार है, वो *पत्रकार सुरक्षा कानून एक्ट बना दे तो सभी पत्रकारों का भला हो जाएगा।* और *अगर नहीं बनाया गया इस मोहन सरकार में, तो फिर पत्रकार नाराज हो जाएंगे। और वो जो कर दिखाएंगे, जो आज तक किसी ने नहीं किया होगा।* जुमले बहुत हुए, बातें बहुत हो गईं, *अब सीधा कैबिनेट में इस नियम को पारित कर दो।*
पत्रकार संगठनों की सालों पुरानी एक ही मांग है: *"पत्रकार सुरक्षा कानून तुरंत लागू करो।"* ज्ञापन दिए, धरने हुए, मुख्यमंत्री को माला पहनाकर मांगपत्र सौंपे। नतीजा? सिर्फ आश्वासन। कानून आज भी ठंडे बस्ते में है।
*विधानसभा की आवाज भी बेअसर?*
मंदसौर विधायक विपिन जैन ने तो इस मुद्दे को विधानसभा के पटल पर भी उठाया था। उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग की थी। *मगर उसके बाद क्या हुआ? क्या उस मांग को आगे की कार्रवाई के लिए बढ़ाया गया है कि नहीं?* सरकार की तरफ से आज तक कोई ठोस जवाब या एक्शन प्लान सार्वजनिक नहीं किया गया। जब चुने हुए विधायक की आवाज का ही ये हाल है, तो आम पत्रकार की सुनवाई की उम्मीद कैसे करे?
*सत्ता का दोहरा चेहरा:*
1. *कोटेशन 1:* "विपक्ष में रहते हुए जो नेता पत्रकारों को 'लोकतंत्र का प्रहरी' बताते थे, सत्ता में आते ही उनकी सुरक्षा के कानून पर चुप क्यों हो जाते हैं? क्या कुर्सी मिलते ही प्राथमिकता बदल जाती है?"
2. *कोटेशन 2:* "प्रदेश में अपराधियों के घर पर बुलडोजर चलाने की बात होती है। बहुत अच्छी बात है। मगर पत्रकार पर हमला करने वाले माफिया पर ये सख्ती कब दिखेगी? या कानून का बुलडोजर सिर्फ चुनिंदा लोगों के लिए है?"
*ये सिर्फ पत्रकार का मुद्दा नहीं, जनता का मुद्दा है:*
सोचिए, अगर डर के कारण पत्रकार ने खनन माफिया पर लिखना बंद कर दिया, भ्रष्टाचार की खबर दबा दी, मिलावटखोरों को बेनकाब करना छोड़ दिया... तो नुकसान किसका होगा? आपका। आपके बच्चों का। पूरे समाज का। जब सच बोलने वाली कलम खामोश होगी, तो लूटने वाले हाथ और मजबूत हो जाएंगे।
*सीधी मांग, सीधा अल्टीमेटम:*
मुख्यमंत्री जी, अब भाषण का दौर खत्म। *पत्रकार सुरक्षा कानून* को इसी विधानसभा सत्र में पेश करिए और *तुरंत लागू करिए*। वरना प्रदेश का हर पत्रकार यही मानेगा कि सरकार नहीं चाहती कि सच सामने आए।
*आज पूरा मध्य प्रदेश हिल जाना चाहिए*, क्योंकि जब लोकतंत्र का पहरेदार ही असुरक्षित होगा, तो लोकतंत्र बचेगा कैसे? ये लड़ाई सिर्फ कलम की नहीं, जनता के हक की है।
*जन हित सर्वोपरि*
*जय भारत*
*संपादक*
*दैनिक मालवा की हुकूमत*
*मो. 9630293934*

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