*किसान को अपराधी न समझें, उसकी मजबूरी समझें: पराली प्रबंधन पर एक कड़वा सच*
जन जागृति संगम न्यूज
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आज जब भी प्रदूषण की बात होती है, तो सबसे पहले उंगली किसान और उसकी जलती हुई पराली पर उठाई जाती है। हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कोई भी किसान खुशी से पराली नहीं जलाता, क्योंकि वह जानता है कि उस आग में उसके खेत के मित्र कीट और मिट्टी की ताकत भी जल रही है।🔥🔥🔥🔥🔥
लेकिन क्या कभी किसी ने किसान के बजट और उसकी तंग समय सीमा (Deadline) पर गौर किया है?
एक तरफ समय की कमी, दूसरी तरफ जेब पर मार
फसल कटाई के तुरंत बाद अगली फसल की तैयारी करनी होती है। खेत से अवशेष हटाने के लिए रोटावेटर और अन्य आधुनिक मशीनों का खर्च 2500 से 3000 रुपये प्रति एकड़ तक बैठता है। डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच एक सामान्य किसान के लिए यह अतिरिक्त बोझ उठाना संभव नहीं है।
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हमारी मांग: जुर्माना नहीं, सहयोग चाहिए
अगर शासन-प्रशासन वाकई में पर्यावरण को लेकर गंभीर है, तो उसे किसान पर कार्रवाई करने के बजाय मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए:
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खर्च का भुगतान: खेत में रोटावेटर चलाने या पराली को मिट्टी में मिलाने पर आने वाला खर्च सरकार वहन करे।
इंसेंटिव (प्रोत्साहन राशि): जो किसान पराली नहीं जलाते, उन्हें प्रति एकड़ के हिसाब से बोनस दिया जाए।
मशीनों की सीधी पहुंच: भारी मशीनें सिर्फ बड़े केंद्रों तक सीमित न रहें, बल्कि हर ग्राम पंचायत स्तर पर उपलब्ध हों।
निष्कर्ष
किसान को सिर्फ सलाह की जरूरत नहीं है, उसे समाधान और आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर सरकार रोटावेटर का खर्च और मशीनों की व्यवस्था कर दे, तो एक भी किसान माचिस की तीली नहीं उठाएगा।
हवा भी साफ रखनी है और किसान की जेब भी बचानी है—यही असली समाधान है!
जिन फैक्ट्री से निकलने वाले धुएं और प्रदूषित पानी से गाय भैंस मर रही जिनकी कितनी ही बार जिला कलेक्टर में शिकायतें हुए पर राजनीतिक प्रभाव के चलते ऊन फैक्ट्री मालिकों के ऊपर कानूनी कार्यवाही नहीं पर किसान बेचारा खेत की सफाई के दौरान अगर परली जलता है तो दंडात्मक कार्रवाई के लिए तैयार होना पड़ता है
🔥🔥🔥🔥🔥🔥 किसान भाइयों के लिए जनहित में जारी *ज्ञानेश प्रजापति*

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