दिव्यांग दीपक के संघर्ष की कहानी: हौसले के आगे मुश्किलें भी छोटी
जन जागृति संगम न्यूज
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दमोह। जिंदगी में मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि हौसला मजबूत हो तो सफलता की उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। दमोह के दिव्यांग युवक दीपक पटेल की संघर्षपूर्ण कहानी इसी जज्बे और उम्मीद की मिसाल है। 95 प्रतिशत नेत्रहीन दिव्यांग दीपक अपने परिवार की कठिन परिस्थितियों के बावजूद लगातार शिक्षा और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
दीपक के परिवार की परिस्थितियां भी बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। उनकी माताजी स्वयं नेत्रहीन दिव्यांग हैं। उनका छोटा भाई और पत्नी भी नेत्रहीन दिव्यांग हैं। पूरा परिवार दिव्यांगता की कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है। सरकार से मिलने वाली सीमित पेंशन के सहारे परिवार का भरण-पोषण चलता है। इसके बावजूद परिवार ने कभी परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी।
शिक्षा को बनाया संघर्ष का हथियार
कठिन परिस्थितियों के बीच दीपक और उनके परिवार के सदस्यों ने शिक्षा हासिल की। योग्यता होने के बावजूद अभी तक परिवार के किसी सदस्य को शासकीय नौकरी नहीं मिल पाई है। दीपक का संघर्ष आज भी जारी है और वे रेलवे सहित अन्य विभागों में रोजगार पाने के लिए लगातार परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
दीपक की सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि नेत्रहीन होने के कारण परीक्षा देने के लिए उन्हें एक ऐसे सहयोगी की आवश्यकता होती है, जो परीक्षा के दौरान उनका साथ दे सके। लंबे समय से उपयुक्त सहयोगी नहीं मिलने के कारण उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
सहयोग के लिए आगे आए एड-हरिश्चंद्र पटेल ने जब सतीश कुसमरिया को बताया तो कुसमरियि जी ने
उन्होंने मदद के लिए आगे आने का निर्णय लिया। उन्होंने महज दो दिनों में खिलान सिंह परिहार को दीपक का सहयोगी बनने के लिए तैयार किया।
खिलान सिंह परिहार और उनके माता-पिता ने भी इस पुनीत कार्य के लिए सहमति दी। इसके बाद सतीश कुसमरिया अपने निजी वाहन से हटा से दमोह पहुंचे और दीपक तथा उनके सहयोगी खिलान सिंह को लेकर सागर गए, ताकि दीपक रेलवे की परीक्षा दे सकें।
एक परीक्षा, एक उम्मीद और पूरे परिवार का भविष्य
दीपक के लिए यह केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि अपने परिवार के भविष्य को बदलने की उम्मीद है। नौकरी मिलने पर वे अपने परिवार को बेहतर जीवन देने के साथ-साथ आगे की शिक्षा और सम्मानजनक जीवन का सपना पूरा करना चाहते हैं।
इस पूरे प्रयास में सहयोग करने वाले खिलान सिंह परिहार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उनके सहयोग की सराहना की गई है। साथ ही सतीश कुसमरिया द्वारा स्वयं वाहन से दीपक और उनके सहयोगी को परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने के प्रयास को मानवीय संवेदना और सामाजिक सहयोग की मिसाल बताया गया है।
सफलता के लिए मांगी दुआ
दीपक के संघर्ष और जज्बे को देखते हुए उनके शुभचिंतकों ने ईश्वर से प्रार्थना की है कि उनकी मेहनत रंग लाए और रेलवे परीक्षा में उन्हें सफलता मिले। दीपक की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
एडवोकेट हरिश्चंद्र पटेल ‘गुड्डू’, सदस्य–जिला विकास सलाहकार समिति, मध्यप्रदेश शासन, दमोह ने दीपक के संघर्ष को सलाम करते हुए समाज के लोगों से उनके लिए आशीर्वाद और शुभकामनाओं की अपील की है।
दीपक की कहानी यही संदेश देती है—परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, हौसला और उम्मीद जिंदा हो तो सफलता का रास्ता जरूर निकलता है।


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