*यह कैसा मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान* *उपमैख्यमंत्री के सामने लाड़ली बहना के आँसू...*
जन जागृति संगम न्यूज
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मध्यप्रदेश में सरकार जनता के दरवाजे तक पहुंचने का दावा कर रही है। मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान चलाया जा रहा है। मंचों से कहा जा रहा है कि सरकार आम आदमी की सरकार है, उसकी समस्याएं सुनी जाएंगी, शिकायतों का समाधान होगा और जनता को सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। लेकिन सवाल यह है कि अगर जनता की आवाज पहले से मौजूद व्यवस्था में ही नहीं सुनी जा रही, तो फिर नए अभियान की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?💥💥💥
एक तरफ मुख्यमंत्री जन-विश्वास की बात हो रही है और दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के सामने एक लाड़ली बहना अपनी पीड़ा बताते-बताते रो पड़ती है। उसकी आंखों से निकले आंसू केवल एक महिला के आंसू नहीं हैं, बल्कि वे उस सिस्टम पर सवाल हैं जिसके दरवाजे पर एक आम नागरिक सालों से दस्तक दे रहा है।
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बताया जा रहा है कि एक बेटी का जाति प्रमाण पत्र वर्षों से नहीं बन पाया। सोचिए, जिस देश में डिजिटल इंडिया की बातें होती हैं, जहां सरकार ऑनलाइन सेवाओं और सुशासन के बड़े-बड़े दावे करती है, वहां एक नागरिक को अपने अस्तित्व से जुड़े दस्तावेज के लिए वर्षों तक परेशान होना पड़े तो इससे बड़ा सिस्टम का मजाक क्या हो सकता है?💥💥💥
और जब यही पीड़ा किसी अधिकारी की मेज से निकलकर किसी मंत्री या उपमुख्यमंत्री के सामने पहुंचती है, तब अचानक सिस्टम जाग जाता है। अधिकारी हरकत में आते हैं, कागज तलाशे जाते हैं, फाइलें खोजी जाती हैं और समस्या के समाधान का आश्वासन दिया जाता है लेकिन सवाल यही है कि आम आदमी को मंत्री के सामने रोने की जरूरत क्यों पड़ती है?
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क्या हर नागरिक अपनी समस्या लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री या विधायक के दरवाजे तक पहुंच सकता है? क्या हर उस व्यक्ति के पास इतना समय, पैसा और पहुंच है कि वह अपनी छोटी-सी सरकारी समस्या के लिए किसी बड़े नेता का इंतजार करे?💥
यहीं से मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान पर भी सवाल खड़ा हो💥💥💥💥💥
जनता का विश्वास किसी अभियान के नाम से नहीं बनता। विश्वास तब बनता है जब शिकायत करने के बाद नागरिक को बार-बार शिकायत न करनी पड़े। विश्वास तब बनता है जब मुख्यमंत्री के पास भेजा गया आवेदन केवल एक नंबर बनकर फाइल में दबा न रह जाए, बल्कि उस पर कार्रवाई भी हो। विश्वास तब बनता है जब मुख्यमंत्री शिकायत हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत का जवाब औपचारिकता के लिए नहीं बल्कि समाधान के लिए दिया जाए।
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आज स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री के ई-मेल पर जाने कितने आवेदन लंबित पड़े होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। कितने आवेदन ऐसे होंगे जिन पर आवेदक आज भी जवाब का इंतजार कर रहा होगा। कितने लोगों ने अपनी समस्या लिखकर भेजी होगी और फिर अपने मोबाइल की स्क्रीन देखते-देखते थक गए होंगे कि शायद कोई जवाब आएगा।
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शिकायत व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य यही होना चाहिए कि आम आदमी को अपनी समस्या लेकर नेता के पास न जाना पड़े। लेकिन यदि शिकायत प्रणाली ही कमजोर हो जाए और नागरिक को अंततः किसी मंत्री या उपमुख्यमंत्री के सामने जाकर अपनी पीड़ा बतानी पड़े, तो फिर उस पूरी व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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सरकारें अक्सर नई-नई योजनाएं और अभियान शुरू करती हैं। नाम बड़े आकर्षक होते हैं। कभी जनसुनवाई, कभी समाधान दिवस, कभी सीएम हेल्पलाइन, कभी जनसेवा अभियान और अब मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान।💥💥
नाम बदलते रहते हैं, लेकिन क्या आम आदमी की परेशानी बदलती है? यह सबसे बड़ा सवाल है।
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सरकारी दफ्तर में बैठा कर्मचारी यदि किसी नागरिक की फाइल महीनों तक रोक सकता है, अधिकारी शिकायत पर कार्रवाई नहीं करता, ऑनलाइन आवेदन के बाद भी दस्तावेज नहीं बनता और शिकायत करने के बाद भी समाधान नहीं होता, तो फिर जनता किस पर विश्वास करे?
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लाड़ली बहना योजना के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की बात सरकार करती है। लेकिन उसी लाड़ली बहना की आंखों में अगर सरकारी व्यवस्था के सामने आंसू आ जाएं तो सरकार को उस आंसू को केवल एक भावुक दृश्य की तरह नहीं देखना चाहिए। उसे इसे सिस्टम की एक्स-रे रिपोर्ट समझना चाहिए।💥💥
एक महिला का रोना सरकार के लिए राजनीतिक दृश्य नहीं, प्रशासनिक चेतावनी होना चाहिए।
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उपमुख्यमंत्री के सामने रोती हुई उस बेटी की तस्वीर शायद कुछ देर बाद सोशल मीडिया पर पुरानी हो जाएगी। वीडियो पर चर्चाएं भी बंद हो जाएंगी। अधिकारी शायद उस मामले का समाधान भी कर देंगे। लेकिन मध्यप्रदेश में ऐसे कितने मामले हैं जिनमें कोई वीडियो नहीं बनता? कितने लोग ऐसे हैं जो अधिकारी के सामने अपनी बात रखने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते? कितनी माताएं, कितने बुजुर्ग, कितने किसान, कितने युवा और कितनी बेटियां सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाकर अंततः हार मान लेते हैं?💥
इन सवालों का जवाब किसी अभियान के उद्घाटन भाषण से नहीं मिलेगा।💥💥💥
जवाब मिलेगा लंबित आवेदनों की संख्या से। जवाब मिलेगा शिकायतों के वास्तविक निपटारे से। जवाब मिलेगा उस नागरिक से जिसे बिना किसी सिफारिश के उसका अधिकार मिला हो।💥💥💥
मुख्यमंत्री जी, जन-विश्वास अभियान जरूर चलाइए, लेकिन उससे पहले अपने सिस्टम का जन-विश्वास ऑडिट कराइए। मुख्यमंत्री के ई-मेल, शिकायत हेल्पलाइन, जनसुनवाई और ऑनलाइन पोर्टलों पर लंबित शिकायतों की वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखिए। बताइए कि कितनी शिकायतें आईं, कितनी का समाधान हुआ, कितनी लंबित हैं और कितनी शिकायतों को केवल कागजों में बंद कर दिया गया।💥💥
क्योंकि जनता को अभियान नहीं, समाधान चाहिए।
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जनता को भाषण नहीं, जवाब चाहिए।
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जनता को आश्वासन नहीं, अपना अधिकार चाहिए।💥💥💥
और सबसे बड़ी बात, आम आदमी को अपनी समस्या बताने के लिए किसी उपमुख्यमंत्री के सामने रोने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
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जिस दिन किसी गरीब की आंख से निकला आंसू सीधे सिस्टम को दिखाई देने लगेगा, उस दिन समझिए कि जन-विश्वास सच में पैदा हो रहा है।💥💥💥💥💥💥💥
वरना अभियान आते रहेंगे, नारे बदलते रहेंगे, पोस्टर लगते रहेंगे और सरकारी फाइलों में आम आदमी की शिकायतें वैसे ही पड़ी रहेंगी।
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फिर सवाल वही रहेगा । क्या ऐसे ही चलता है सिस्टम?क्या ऐसे ही आम जनता रोती रहे💥💥💥 जनहित में जारी ज्ञानेश प्रजापति
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