*सच्चा ज्ञान वही है जो आचरण में उतरे लाभचंद नाप वालिया*
जन जागृति संगम न्यूज़
एमपी ब्यूरो चीफ जगदीश राठौर 9425490641
जावरा : पर्वाधिराज पर्युषण के दुसरे दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए नीमच से पधारे वरिष्ट स्वाध्यायी लाभचंद नापवालिया ने फ़रमाया कि जैन धर्म के 12 अंग शास्त्रों में से आठवें अंग शास्त्र 'अंतगड दशांग सूत्र' में 90 महान आत्माओं के जीवन चरित्र और उनकी कठोर साधना यात्रा का विस्तृत विवरण मिलता है।'अंतकृत' उन महान आत्माओं को कहा जाता है जिन्होंने अपने अष्ट कर्मों का क्षय करके चतुर्गति रूप संसार में भव भ्रमण का अंत कर दिया और इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त किया। 8 वर्ग और 90 अध्ययन इस सूत्र को 8 वर्गों में विभाजित किया गया है, जिसके अंतर्गत कुल 90 अध्ययन हैं। प्रत्येक अध्ययन में एक विशिष्ट आत्मा के त्याग, वैराग्य, तपस्या और मोक्ष प्राप्ति की गाथा बताई गई है। इसमें 22वें तीर्थंकर भगवान अरिष्ट नेमि और भगवान महावीर के समकालीन कई महान साधकों का वर्णन है, जैसे,गज सुकुमाल मुनि, अर्जुन माली मुनि, धारणी रानी आदि, जैन परंपरा में पर्यूषण पर्व के दौरान इस पावन आगम सूत्र का विशेष रूप से वाचन और श्रवण किया जाता है। जैन धर्म में ज्ञान के मुख्य रूप से पांच भेद मति, श्रुत, अवधि, मनः पर्यय, और केवल ज्ञान बताए गए हैं, लेकिन आत्मा द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के साधन और माध्यम के आधार पर इन पाँच ज्ञान को दो प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। परोक्ष ज्ञान यह वह ज्ञान है जो आत्मा को सीधे प्राप्त नहीं होता,
बल्कि इसके लिए इंद्रियों की आवश्यकता होती है। चूंकि यह पराश्रित है, इसलिए इसे 'परोक्ष' कहा जाता प्रत्यक्ष ज्ञान यह वह ज्ञान है जो बिना किसी इंद्रिय या मन की सहायता के, सीधे आत्मा द्वारा अपने भीतर से अनुभव किया जाता है।जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है यह वाक्य जीवन का सबसे बड़ा और गहरा महामंत्र है। यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि परम शांति, संतोष और मानसिक समृद्धि का द्वार है।जब हम इस भाव को आत्मसात कर लेते हैं, तो हमारी आधी से ज्यादा मानसिक चिंताएं और शिकायतें अपने आप खत्म हो जाती हैं।सत्य और असत्य का भेद: जब आत्मा को सच्चा ज्ञान होता है, तो उसे समझ आ जाता है कि संसार की वस्तुएं, पद और रिश्ते अस्थायी हैं। दिखावे का अंत: सच्चा ज्ञान मनुष्य को यह सिखाता है कि जिस 'मैं और मेरा' के पीछे वह भाग रहा है, वह केवल एक भ्रम है। इस बोध के होते ही मन में संसार के प्रति राग टूटने लगता है और सहज ही विरक्ति आ जाती है।
सूखी जानकारी बनाम वास्तविक ज्ञान: यदि किसी के पास बहुत जानकारी है लेकिन मन में वासना, क्रोध या लोभ बना हुआ है, तो जैन दर्शन के अनुसार वह सच्चा ज्ञान नहीं, केवल 'जानकारी' या 'अज्ञान' है। सच्चा ज्ञान वही है जो आचरण में उतरे और भीतर वैराग्य जगाए। यदि ज्ञान होने के बाद भी संसार की चीजों को पकड़ने की तड़प बनी रहे, तो वह ज्ञान अभी अधूरा है। जब ज्ञान परिपक्व होता है, तो इंसान जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है के भाव में जीते हुए संसार में कमल के पत्ते की तरह अनासक्त हो जाता है। सावरमल एवं लाभचंद ने शास्त्र वाचन किया प्रवचन की प्रभावना का लाभ सूरज बाई सम्पत बाई सोहंदेवी की स्मृति में सुरेन्द्र मेहता परिवार ने लिया। धर्म सभा का संचालन महामंत्री महावीर छाजेड ने किया आभार विनोद ओस्तवाल ने माना।



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