*बेटियां बनीं पिता का सहारा, अंतिम यात्रा में निभाया बेटे से बढ़कर फर्ज*
जन जागृति संगम न्यूज
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राजस्थान के रामगढ़ तहसील अंतर्गत बागास गांव में एक भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जिसने समाज को बेटियों की ताकत और संस्कारों का संदेश दिया। यहां दो बेटियों ने अपने पिता की अंतिम यात्रा में वह जिम्मेदारी निभाई, जिसे अक्सर समाज केवल बेटों का कर्तव्य मानता आया है।
गांव निवासी ओमप्रकाश बॉयल, जो डीडवाना की एक फैक्ट्री में मुनीम के पद पर कार्यरत थे, का हृदयाघात से मात्र 48 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अचानक हुई इस घटना से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सूचना मिलते ही उनकी छोटी बेटी शिवानी, जो नर्सिंग की छात्रा है, अस्पताल पहुंची, लेकिन तब तक पिता दुनिया को अलविदा कह चुके थे।
ओमप्रकाश की दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी अन्नू बीएड की पढ़ाई कर रही है, जबकि छोटी बेटी शिवानी नर्सिंग की छात्रा है। पिता के निधन के बाद दोनों बेटियों ने समाज की परंपरागत सोच से ऊपर उठते हुए बेटे का फर्ज निभाया। उन्होंने अपने पिता की अंतिम यात्रा में कंधा दिया और 45 डिग्री की भीषण गर्मी में पूरे साहस के साथ श्मशान घाट तक पार्थिव शरीर को पहुंचाया।
ग्रामीणों के लिए यह दृश्य बेहद भावुक करने वाला था। जिस पिता का हाथ कभी बेटियों के सिर पर सुरक्षा और हौसले का प्रतीक था, उसी पिता को अंतिम विदाई देते समय बेटियों ने खुद को मजबूत रखते हुए साहस और संस्कार की अनूठी मिसाल पेश की।
गांव और आसपास के क्षेत्र में दोनों बेटियों की जमकर सराहना हो रही है। लोगों का कहना है कि इन बेटियों ने साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। उनके साहस, जिम्मेदारी और पिता के प्रति सम्मान को हर कोई सलाम कर रहा है।
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